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इतिहास शिक्षण का निर्णायक उपकरण शिक्षक

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किसी विषय का शिक्षण एक कला है । जो विषय की प्रकृति के अनुसार बदलती रहती है । इसलिए विषय शिक्षक, कक्षा में शिक्षण के क्रम में विषय की अवधारणाओं को समझाने के दौरान कई चुनौतियों से रूबरू होता है । यह चुनौतियाँ कमोबेश हर विषय की प्रकृति में होती हैं जो विद्यार्थियों के अधिगम स्तर के साथ मिलकर शिक्षण को और अधिक गंभीर बना देती हैं । शिक्षण में आनेवाली इन चुनौतियों का हल जब विषयी शिक्षक प्रशिक्षित हो रहे होते हैं तो उस समय ही कुछ बातों का ध्यान रख इन चुनौतियों का एक उचित हल पाया जा सकता है । उदाहरणस्वरूप इतिहास शिक्षण के लिए तैयार हो रहे शिक्षकों को यह बताया जाए कि विद्यालयी इतिहास पुस्तकलेखन और इतिहास विषय के शिक्षण में समन्वय कम है क्योंकि अमूमन इन दोनों कामों को करनेवाले लोग अलग-अलग हैं । इस अंतर को पाटने के लिए प्रशिक्षु-शिक्षकों में यह समझ विकसित करनी होगी कि इतिहास शिक्षकों को निर्मित करने में इतिहासकारों की भूमिका किस प्रकार की है (इतिहास लेखन की प्रकृति को समझना, इतिहासकार की दृष्टि को परखना), इसके साथ ही इतिहास विषय को पढ़ाना और सीखना क्या होता है इसको भी ध्यान में रखना बेहद जरूरी है । इसके अतिरिक्त इतिहास विषय की प्रकृति को भी जानना जरूरी है जैसेकि इतिहास क्या है, यह विद्यालयी शिक्षा में क्यों जरूरी है साथ ही इतिहास शिक्षण के उपरांत शिक्षार्थी में किन-किन क्षमताओं का विकास होता साथ ही इसके अन्य महत्वपूर्ण पहलू पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकों की प्रकृति ( विषयवस्तु और उद्देश्य ) से भी भली-भांति परिचित होना जरूरी है, क्योंकि इससे शिक्षक कक्षाई विविधता और विद्यार्थियों के पृष्ठभूमि से परिचित होकर कक्षा में इतिहास का समावेशी शिक्षण कर सकेंगे । जिससे कृष्ण कुमार के शब्दों में शिक्षक “मीक तानाशाह” की छवि से भी मुक्त हो सकेंगे । इतिहास की अवधारणाओं को समझने के लिए शिक्षकों द्वारा शिक्षार्थियों में कुछ बुनियादी समझ को विकसित करने की जरूरत है जैसेकि समय के बदलाव की अवधारणा, कारणता, संदर्भ, जटिलता, संभावना इत्यादि । जिससे शिक्षार्थी प्राथमिक एवं गौण स्रोतों से प्राप्त ऐतिहासिक अर्थ को समझकर उसके पक्ष और विपक्ष में तर्क गढ़ सकेंगे, जो इतिहास शिक्षण का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य है । जिससे पाठ्यचर्या के व्यक्त और अव्यक्त उद्देश्य भी पूरा हो सकेंगे ।
Title: इतिहास शिक्षण का निर्णायक उपकरण शिक्षक
Description:
किसी विषय का शिक्षण एक कला है । जो विषय की प्रकृति के अनुसार बदलती रहती है । इसलिए विषय शिक्षक, कक्षा में शिक्षण के क्रम में विषय की अवधारणाओं को समझाने के दौरान कई चुनौतियों से रूबरू होता है । यह चुनौतियाँ कमोबेश हर विषय की प्रकृति में होती हैं जो विद्यार्थियों के अधिगम स्तर के साथ मिलकर शिक्षण को और अधिक गंभीर बना देती हैं । शिक्षण में आनेवाली इन चुनौतियों का हल जब विषयी शिक्षक प्रशिक्षित हो रहे होते हैं तो उस समय ही कुछ बातों का ध्यान रख इन चुनौतियों का एक उचित हल पाया जा सकता है । उदाहरणस्वरूप इतिहास शिक्षण के लिए तैयार हो रहे शिक्षकों को यह बताया जाए कि विद्यालयी इतिहास पुस्तकलेखन और इतिहास विषय के शिक्षण में समन्वय कम है क्योंकि अमूमन इन दोनों कामों को करनेवाले लोग अलग-अलग हैं । इस अंतर को पाटने के लिए प्रशिक्षु-शिक्षकों में यह समझ विकसित करनी होगी कि इतिहास शिक्षकों को निर्मित करने में इतिहासकारों की भूमिका किस प्रकार की है (इतिहास लेखन की प्रकृति को समझना, इतिहासकार की दृष्टि को परखना), इसके साथ ही इतिहास विषय को पढ़ाना और सीखना क्या होता है इसको भी ध्यान में रखना बेहद जरूरी है । इसके अतिरिक्त इतिहास विषय की प्रकृति को भी जानना जरूरी है जैसेकि इतिहास क्या है, यह विद्यालयी शिक्षा में क्यों जरूरी है साथ ही इतिहास शिक्षण के उपरांत शिक्षार्थी में किन-किन क्षमताओं का विकास होता साथ ही इसके अन्य महत्वपूर्ण पहलू पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकों की प्रकृति ( विषयवस्तु और उद्देश्य ) से भी भली-भांति परिचित होना जरूरी है, क्योंकि इससे शिक्षक कक्षाई विविधता और विद्यार्थियों के पृष्ठभूमि से परिचित होकर कक्षा में इतिहास का समावेशी शिक्षण कर सकेंगे । जिससे कृष्ण कुमार के शब्दों में शिक्षक “मीक तानाशाह” की छवि से भी मुक्त हो सकेंगे । इतिहास की अवधारणाओं को समझने के लिए शिक्षकों द्वारा शिक्षार्थियों में कुछ बुनियादी समझ को विकसित करने की जरूरत है जैसेकि समय के बदलाव की अवधारणा, कारणता, संदर्भ, जटिलता, संभावना इत्यादि । जिससे शिक्षार्थी प्राथमिक एवं गौण स्रोतों से प्राप्त ऐतिहासिक अर्थ को समझकर उसके पक्ष और विपक्ष में तर्क गढ़ सकेंगे, जो इतिहास शिक्षण का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य है । जिससे पाठ्यचर्या के व्यक्त और अव्यक्त उद्देश्य भी पूरा हो सकेंगे ।.

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