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श्रीमद्भागवत महापुराण में अन्तर्निहित भक्ति तत्व

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भक्ति‘ शब्द भज-सेवायाम् धातु में ‘क्ति’ (प्रेम) प्रत्यय के योग से बना है। सामान्य नियमानुसार धातु और प्रत्यय के योग से निमित्त शब्द के अर्थ में प्रत्ययार्थ ही प्रधान रहता है परन्तु यहाँ उसका अर्थ है- सप्रेम सेवा। सेवा शारीरिक क्रिया है। सच्ची सेवा में प्रेम का भाव निहित रहता है। प्रेम भावहीन सेवा कार्य क्लेश होने के कारण स्पृहणीय नहीं रहता। प्रेम की पूर्णता सेवाभाव में ही है। नारदीय ‘पंचरात्र’ के अनुसार ‘‘सम्पूर्ण इन्द्रियों को माया के बन्धन से सर्वथा मुक्त करके अनन्य मनसा भगवदाराधना ही भक्ति है। भक्ति के साम्राज्य में भोक्ता और भोग्य दोनों ही पारस्परिक सहचर्यजन्य आनन्द का उपयोग करने के लिए चिन्मय देहेन्द्रिय-विशिष्ट होते है।‘‘
Granthaalayah Publications and Printers
Title: श्रीमद्भागवत महापुराण में अन्तर्निहित भक्ति तत्व
Description:
भक्ति‘ शब्द भज-सेवायाम् धातु में ‘क्ति’ (प्रेम) प्रत्यय के योग से बना है। सामान्य नियमानुसार धातु और प्रत्यय के योग से निमित्त शब्द के अर्थ में प्रत्ययार्थ ही प्रधान रहता है परन्तु यहाँ उसका अर्थ है- सप्रेम सेवा। सेवा शारीरिक क्रिया है। सच्ची सेवा में प्रेम का भाव निहित रहता है। प्रेम भावहीन सेवा कार्य क्लेश होने के कारण स्पृहणीय नहीं रहता। प्रेम की पूर्णता सेवाभाव में ही है। नारदीय ‘पंचरात्र’ के अनुसार ‘‘सम्पूर्ण इन्द्रियों को माया के बन्धन से सर्वथा मुक्त करके अनन्य मनसा भगवदाराधना ही भक्ति है। भक्ति के साम्राज्य में भोक्ता और भोग्य दोनों ही पारस्परिक सहचर्यजन्य आनन्द का उपयोग करने के लिए चिन्मय देहेन्द्रिय-विशिष्ट होते है।‘‘.

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