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बृहत्संहिता में भूगर्भ जलविद्या

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जल ही जीवन है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जीवन का प्रारम्भ ही जल से हुआ है। जल की आवश्यकता मनुष्य को नित्य प्रति पड़ती है। इसके बिना जीवन नहीं चल सकता। इसलिये मानव सभ्यता का विकास ही नदियों के तट पर हुआ। कालान्तर में जनसंख्या बढ़ती गयी और जल संग्रहण के नये उपादान बनते गये और मनुष्य नदियों तट से हटकर दूर स्थानों में बसने लगे। जिसके फलस्वरूप कुओं की संस्कृति का विकास हुआ। वर्तमान समय में कुओं और नदियों का पानी पीने योग्य ही नहीं रह गया है। आज मानव पीने के पानी के लिये भूगर्भ जल पर ही निर्भर है, अतः इस युग में स्वादिष्ट व प्रचुर भूगर्भ जल कहाँ प्राप्त होगा, इसका ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है। आचार्य वराहमिहिर द्वारा रचित ग्रन्थ बृहत्संहिता में भूगर्भ जल विद्या का वैज्ञानिक और विस्तृत वर्णन दिया गया है। बृहत्संहिता में वर्णित लक्षणों द्वारा, मानव समाज भूगर्भ जल प्राप्त कर लाभान्वित हो सकता हैं। प्रस्तुत शोधपत्र में बृहत्संहिता के अनुसार भूगर्भ जल की परिभाषा, जल चिन्हों का वैज्ञानिक प्रतिपादन, वृक्ष तथा बाँबी के लक्षण से जल विचार, तृण शाकादि के द्वारा जल विचार, भू-लक्षण के अनुसार जल विचार, अन्य चिन्हों से जल विचार एवं जल शोधन की विधि के बारे में उल्लेख किया गया है। आधुनिक युग में भूमिगत जल के लिये मनुष्य ट्यूबेल खुदवाते हैं किन्तु कई जगह में उन्हें सफलता प्राप्त नहीं होती, जिसके कारण पैसे, श्रम व समय की बर्बादी के साथ निराशा के सिवा कुछ हाथ नहीं लगता। यदि बृहत्संहिता में दिये गये भू गर्भ लक्षण के अनुसार कुआँ अथवा ट्यूबेल खुदवायें तो सफलता प्राप्त होने की अधिक सम्भावना बनती है।
Title: बृहत्संहिता में भूगर्भ जलविद्या
Description:
जल ही जीवन है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जीवन का प्रारम्भ ही जल से हुआ है। जल की आवश्यकता मनुष्य को नित्य प्रति पड़ती है। इसके बिना जीवन नहीं चल सकता। इसलिये मानव सभ्यता का विकास ही नदियों के तट पर हुआ। कालान्तर में जनसंख्या बढ़ती गयी और जल संग्रहण के नये उपादान बनते गये और मनुष्य नदियों तट से हटकर दूर स्थानों में बसने लगे। जिसके फलस्वरूप कुओं की संस्कृति का विकास हुआ। वर्तमान समय में कुओं और नदियों का पानी पीने योग्य ही नहीं रह गया है। आज मानव पीने के पानी के लिये भूगर्भ जल पर ही निर्भर है, अतः इस युग में स्वादिष्ट व प्रचुर भूगर्भ जल कहाँ प्राप्त होगा, इसका ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है। आचार्य वराहमिहिर द्वारा रचित ग्रन्थ बृहत्संहिता में भूगर्भ जल विद्या का वैज्ञानिक और विस्तृत वर्णन दिया गया है। बृहत्संहिता में वर्णित लक्षणों द्वारा, मानव समाज भूगर्भ जल प्राप्त कर लाभान्वित हो सकता हैं। प्रस्तुत शोधपत्र में बृहत्संहिता के अनुसार भूगर्भ जल की परिभाषा, जल चिन्हों का वैज्ञानिक प्रतिपादन, वृक्ष तथा बाँबी के लक्षण से जल विचार, तृण शाकादि के द्वारा जल विचार, भू-लक्षण के अनुसार जल विचार, अन्य चिन्हों से जल विचार एवं जल शोधन की विधि के बारे में उल्लेख किया गया है। आधुनिक युग में भूमिगत जल के लिये मनुष्य ट्यूबेल खुदवाते हैं किन्तु कई जगह में उन्हें सफलता प्राप्त नहीं होती, जिसके कारण पैसे, श्रम व समय की बर्बादी के साथ निराशा के सिवा कुछ हाथ नहीं लगता। यदि बृहत्संहिता में दिये गये भू गर्भ लक्षण के अनुसार कुआँ अथवा ट्यूबेल खुदवायें तो सफलता प्राप्त होने की अधिक सम्भावना बनती है।.

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