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वैदिक संस्कृति में वृक्ष-पूजा: एक अध्ययन

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वैदिक वाङ्मय में वृक्षों की उपादेयता को महिमामंडित किया गया है। ऋग्वेद में वृक्षों को वनस्पति (वनों के अधिपति) कहा गया है। वनस्पतियों को देवता केे रूप में ख्याति प्राप्ति करके एक मंत्र में यह कामना की है- ‘‘पर्वत हमारे धन की रक्षा करें, हमारी सहायता औषधियां, अन्तरिक्ष, भूमण्डल, पेड़-पौधे एवं जल हमारे पालक हो।‘‘1 इस तरह से अन्य स्थलों पर पर्वतों, वनस्पतियों, नदियों, इक्कीस नदियों, बाण चलाने वालों, नक्षत्रों, रूद्र, अग्नि आदि देवताओं की यज्ञ में स्तुति किये जाने का उल्लेख है।2 इन स्थलों पर वृक्षों को देवता की कोटि में गौरवशाली माना गया है। ऋग्वेद के दशवें मण्डल में सम्पूर्ण 146 सूक्त ‘अरण्यानी‘ नाम से सम्पूर्ण वन को एक देवी मानकर श्रद्धा में समर्पित है। इसे आकर्षित खाद्य सामग्री से परिपूर्ण एवं पशुओं की माता कहा गया है।3 इसके बारे में रात की ध्वनिहीनता में वन में सुनाई पड़ने वाली कई प्रकार की ध्वनियों का आश्चर्यजनक रूप में वर्णन किया गया है। विशाल अरण्यानी की वन्दना करते हुए बताया गया है। प्रारम्भिक समय में उस स्थान पर कृषि की कमी थी, हिरनों को विश्राम मिलता था, इसलिए विशाल अरण्यानी वन्दना के योग्य है।4 इस सूक्त में कहा गया है कि इष्ट देवी जंगल की देवी अन्तर्धान हो जाती थी। पशु-पक्षियों के कलरव उसकी कीर्तिमान माना जाता था।5 इस तरह से वन देवी की पूजा का वर्णन ऋग्वेद से प्राप्त होता है। वैदिक संस्कृति में वृक्षों एवं वनस्पतियों से प्राप्त औषधियों को अद्भुत माना जाता था। ऋग्वेद के 10वें मण्डल में 97वां सूक्त में औषधियों की वन्दना में समर्पित है। औषधियों की उपयोगिता को स्वीकार करते हुए एक मंत्र में उनसे इस प्रकार निवेदन किया गया है कि- ‘‘हे पुष्प फलों से सम्पन्न औषधियों। तुम मरीज पर परोपकार करो। रण क्षेत्र में जैसे अश्व विजय प्राप्त करते हुए प्रगतिशील होते है। उसी प्रकार रोग पर तुम विजय प्राप्त करती रहो। इन पुरूषों को रोग से मुक्त करो।6 ऋग्वेद में पीपल और पलाश के वृक्ष में दवाईयों का अधिवास होता है।7 इसके अनुसार कह सकते है कि जीवन रक्षक दवाईयों के प्रदाता के रूप में पीपल तथा पलाश का पेड़ आराध्य बन गये। अथर्ववेद में उल्लेख है कि दवाईयों के रूप में प्रयोग होने वाली किसी भी जड़ी को ‘माता पृथ्वी पर उपजी देवी‘ कहना चाहिए।8 इस तरह से कहा जा सकता है कि साधन स्थान वृक्ष के प्राण रक्षक होने के कारण आस्था के पात्र बन गये एवं इसलिए उनकी गिनती देवताओं की श्रेणी में की जाने लगी। इस प्रकार वृक्ष लोक-देवताओं के रूप में सुप्रसिद्ध हो गये।
Title: वैदिक संस्कृति में वृक्ष-पूजा: एक अध्ययन
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वैदिक वाङ्मय में वृक्षों की उपादेयता को महिमामंडित किया गया है। ऋग्वेद में वृक्षों को वनस्पति (वनों के अधिपति) कहा गया है। वनस्पतियों को देवता केे रूप में ख्याति प्राप्ति करके एक मंत्र में यह कामना की है- ‘‘पर्वत हमारे धन की रक्षा करें, हमारी सहायता औषधियां, अन्तरिक्ष, भूमण्डल, पेड़-पौधे एवं जल हमारे पालक हो।‘‘1 इस तरह से अन्य स्थलों पर पर्वतों, वनस्पतियों, नदियों, इक्कीस नदियों, बाण चलाने वालों, नक्षत्रों, रूद्र, अग्नि आदि देवताओं की यज्ञ में स्तुति किये जाने का उल्लेख है।2 इन स्थलों पर वृक्षों को देवता की कोटि में गौरवशाली माना गया है। ऋग्वेद के दशवें मण्डल में सम्पूर्ण 146 सूक्त ‘अरण्यानी‘ नाम से सम्पूर्ण वन को एक देवी मानकर श्रद्धा में समर्पित है। इसे आकर्षित खाद्य सामग्री से परिपूर्ण एवं पशुओं की माता कहा गया है।3 इसके बारे में रात की ध्वनिहीनता में वन में सुनाई पड़ने वाली कई प्रकार की ध्वनियों का आश्चर्यजनक रूप में वर्णन किया गया है। विशाल अरण्यानी की वन्दना करते हुए बताया गया है। प्रारम्भिक समय में उस स्थान पर कृषि की कमी थी, हिरनों को विश्राम मिलता था, इसलिए विशाल अरण्यानी वन्दना के योग्य है।4 इस सूक्त में कहा गया है कि इष्ट देवी जंगल की देवी अन्तर्धान हो जाती थी। पशु-पक्षियों के कलरव उसकी कीर्तिमान माना जाता था।5 इस तरह से वन देवी की पूजा का वर्णन ऋग्वेद से प्राप्त होता है। वैदिक संस्कृति में वृक्षों एवं वनस्पतियों से प्राप्त औषधियों को अद्भुत माना जाता था। ऋग्वेद के 10वें मण्डल में 97वां सूक्त में औषधियों की वन्दना में समर्पित है। औषधियों की उपयोगिता को स्वीकार करते हुए एक मंत्र में उनसे इस प्रकार निवेदन किया गया है कि- ‘‘हे पुष्प फलों से सम्पन्न औषधियों। तुम मरीज पर परोपकार करो। रण क्षेत्र में जैसे अश्व विजय प्राप्त करते हुए प्रगतिशील होते है। उसी प्रकार रोग पर तुम विजय प्राप्त करती रहो। इन पुरूषों को रोग से मुक्त करो।6 ऋग्वेद में पीपल और पलाश के वृक्ष में दवाईयों का अधिवास होता है।7 इसके अनुसार कह सकते है कि जीवन रक्षक दवाईयों के प्रदाता के रूप में पीपल तथा पलाश का पेड़ आराध्य बन गये। अथर्ववेद में उल्लेख है कि दवाईयों के रूप में प्रयोग होने वाली किसी भी जड़ी को ‘माता पृथ्वी पर उपजी देवी‘ कहना चाहिए।8 इस तरह से कहा जा सकता है कि साधन स्थान वृक्ष के प्राण रक्षक होने के कारण आस्था के पात्र बन गये एवं इसलिए उनकी गिनती देवताओं की श्रेणी में की जाने लगी। इस प्रकार वृक्ष लोक-देवताओं के रूप में सुप्रसिद्ध हो गये।.

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