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सैन्धव सभ्यता में वृक्ष पूजा: एक अध्ययन

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सैन्धव सभ्यता का प्रथम पुरास्थल हड़प्पा था जिसके आधार पर इसका नाम हड़प्पा सभ्यता किया गया था।1 सैन्धव सभ्यता सिन्धु नदी घाटी तक सीमित नहीं है लेकिन सैन्धव सभ्यता के क्षेत्र के अन्तर्गत बलूचिस्तान, पश्चिम उत्तर सीमा प्रान्त, पंजाब, सिंधु, काठियावाड़ का भाग, राजपूताना एवं गंगा घाटी का उत्तरी भाग तक फैला है। सैन्धव सभ्यता के प्रमुख केन्द्रों में दरबार-कोट, पेरियानो, राना घुण्डई, कुल्ली, मेही, चन्हूदड़ो, आमरी, मोहनजोदड़ो, अलीमुराद, रोपड़, रंगपुर, अतरंजीखेड़ा, सुत्कागेण्डोर उल्लेखनीय हैं। हड़प्पा कालीन संस्कृति नगरीय एवं व्यापार पर आधारित थी। हड़प्पा संस्कृति के निर्माण में अनेक जातियों के लोगों का योगदान प्रमुख था, जैसे- काकेशियन, भूमध्यसागरीय, मंगोलियन एवं अल्पाइन इत्यादि। हड़प्पा कालीन संस्कृति में बहुदेववादी धार्मिक दृष्टिकोण देखा गया। सैन्धव सभ्यता के लोग जल, मातृ देवी, पशुपति देव, नाग तथा शक्ति की उपासना में विश्वास करते थे।2 सैन्धव सभ्यता के लोगों का ताबीज तथा जादू-टोने पर विश्वास था।3 सर जाॅन मार्शल ने मोहनजोदड़ों में लकड़ी के मंदिर प्राप्त होने की सम्भावना प्रतीत की है।4 इससे पता चलता है कि सैन्धव सभ्यता के लोगों का वृक्ष पूजा में विश्वास था।5 पुरातात्विक उत्खनन के आधार पर हड़प्पा कालीन संस्कृति में वृक्ष पूजा के दो स्वरूप देखने को मिलते है।
Title: सैन्धव सभ्यता में वृक्ष पूजा: एक अध्ययन
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सैन्धव सभ्यता का प्रथम पुरास्थल हड़प्पा था जिसके आधार पर इसका नाम हड़प्पा सभ्यता किया गया था।1 सैन्धव सभ्यता सिन्धु नदी घाटी तक सीमित नहीं है लेकिन सैन्धव सभ्यता के क्षेत्र के अन्तर्गत बलूचिस्तान, पश्चिम उत्तर सीमा प्रान्त, पंजाब, सिंधु, काठियावाड़ का भाग, राजपूताना एवं गंगा घाटी का उत्तरी भाग तक फैला है। सैन्धव सभ्यता के प्रमुख केन्द्रों में दरबार-कोट, पेरियानो, राना घुण्डई, कुल्ली, मेही, चन्हूदड़ो, आमरी, मोहनजोदड़ो, अलीमुराद, रोपड़, रंगपुर, अतरंजीखेड़ा, सुत्कागेण्डोर उल्लेखनीय हैं। हड़प्पा कालीन संस्कृति नगरीय एवं व्यापार पर आधारित थी। हड़प्पा संस्कृति के निर्माण में अनेक जातियों के लोगों का योगदान प्रमुख था, जैसे- काकेशियन, भूमध्यसागरीय, मंगोलियन एवं अल्पाइन इत्यादि। हड़प्पा कालीन संस्कृति में बहुदेववादी धार्मिक दृष्टिकोण देखा गया। सैन्धव सभ्यता के लोग जल, मातृ देवी, पशुपति देव, नाग तथा शक्ति की उपासना में विश्वास करते थे।2 सैन्धव सभ्यता के लोगों का ताबीज तथा जादू-टोने पर विश्वास था।3 सर जाॅन मार्शल ने मोहनजोदड़ों में लकड़ी के मंदिर प्राप्त होने की सम्भावना प्रतीत की है।4 इससे पता चलता है कि सैन्धव सभ्यता के लोगों का वृक्ष पूजा में विश्वास था।5 पुरातात्विक उत्खनन के आधार पर हड़प्पा कालीन संस्कृति में वृक्ष पूजा के दो स्वरूप देखने को मिलते है।.

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