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मेवाड चित्र शैली के अतंर्गत रामायण के चित्रो का सौन्दर्यात्मक अध्ययन

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15वीं शताब्दी के लगभग राजस्थान लघुचित्र शैली का उदभव व विकास माना जाता है। इस काल मे राजस्थानी चित्रकारो ने अपनी कला को श्रीकृष्ण व राम के पवित्र चरित्राकंन से सम्पूर्ण किया है। यह वही समय था जब श्रीकृष्ण व राम के चरित्र से सभी जनो को साक्षातकार कराने वाली ब्रजभाषा की उन्नति और बल्लभ सम्प्रदाय की पुष्टि मार्गीय शाखा का अभ्युदय हुआ। दोनो ने अपने समय की चित्रकला को प्रभावित किया। रामानन्द चैतन्य बल्लभाचार्य सूर तुलसी मीरा आदि के भक्ति आदोंलन को इस काल मे बल मिला। भारतीय पुराण शास्त्र व धर्म के सरक्ष्ंाण में पनप रही शैली को अपभ्रशं शैली का नाम दिया गया। अपभ्रशं शैली से ही राजपूत कालीन चित्र शैली का उत्थान हुआ। क्योकिं अपभ्रशं शैली के ह्रास होने पर राजपूत राजाओ ने अपने राज सिेहासन मे विभिन्न चित्रकारो को संरक्षण देकर चित्र शैली को राजसिंहासन तक ही सीमित रखा। जिससे इस शैली को राजपूत कालीन या राजस्थानी शैली पुकारा जाता है। इसका चित्रण समय 1400 ई0 से 1800 ई0 तक माना गया है। राजपूत कालीन शैली के अन्तर्गत कई विभिन्न उपशैलियां पनपी जिसमे मेवाड, मालवा, बुन्देलखण्ड, जोधपुर, बूंदी, कोटा, किशनगढ, बीकानेर, जयपुर आदि है। कुमार स्वामी ने अध्यात्मिक और सौन्दर्यात्मक पक्ष को लेकर इस शैली की कुछ मान्यताओ को लेकर किया है। तथा इस शैली को प्राचीन लोक कथाओ शास्त्रीय कला आदि से स्थापित किया है। डा वीसलग्रे सन 1600 ई से सन 1620 ई के मध्य इस शैली का उदय माना है। उन्होनें वस्त्रालंकार वेश-भूषा के आधार पर मुगल शैली व अपभ्रंश शैली इन दोनो शैलियो पर अन्तर स्थापित किया है रगं योजना रचना विधि और माध्यम की दृष्टि से इस शैली में मुगल शैली से अलग है। राजपुत कलीन चित्रशैली में भी अधिकाशं चित्र ग्रन्थ चित्र हैं।
Title: मेवाड चित्र शैली के अतंर्गत रामायण के चित्रो का सौन्दर्यात्मक अध्ययन
Description:
15वीं शताब्दी के लगभग राजस्थान लघुचित्र शैली का उदभव व विकास माना जाता है। इस काल मे राजस्थानी चित्रकारो ने अपनी कला को श्रीकृष्ण व राम के पवित्र चरित्राकंन से सम्पूर्ण किया है। यह वही समय था जब श्रीकृष्ण व राम के चरित्र से सभी जनो को साक्षातकार कराने वाली ब्रजभाषा की उन्नति और बल्लभ सम्प्रदाय की पुष्टि मार्गीय शाखा का अभ्युदय हुआ। दोनो ने अपने समय की चित्रकला को प्रभावित किया। रामानन्द चैतन्य बल्लभाचार्य सूर तुलसी मीरा आदि के भक्ति आदोंलन को इस काल मे बल मिला। भारतीय पुराण शास्त्र व धर्म के सरक्ष्ंाण में पनप रही शैली को अपभ्रशं शैली का नाम दिया गया। अपभ्रशं शैली से ही राजपूत कालीन चित्र शैली का उत्थान हुआ। क्योकिं अपभ्रशं शैली के ह्रास होने पर राजपूत राजाओ ने अपने राज सिेहासन मे विभिन्न चित्रकारो को संरक्षण देकर चित्र शैली को राजसिंहासन तक ही सीमित रखा। जिससे इस शैली को राजपूत कालीन या राजस्थानी शैली पुकारा जाता है। इसका चित्रण समय 1400 ई0 से 1800 ई0 तक माना गया है। राजपूत कालीन शैली के अन्तर्गत कई विभिन्न उपशैलियां पनपी जिसमे मेवाड, मालवा, बुन्देलखण्ड, जोधपुर, बूंदी, कोटा, किशनगढ, बीकानेर, जयपुर आदि है। कुमार स्वामी ने अध्यात्मिक और सौन्दर्यात्मक पक्ष को लेकर इस शैली की कुछ मान्यताओ को लेकर किया है। तथा इस शैली को प्राचीन लोक कथाओ शास्त्रीय कला आदि से स्थापित किया है। डा वीसलग्रे सन 1600 ई से सन 1620 ई के मध्य इस शैली का उदय माना है। उन्होनें वस्त्रालंकार वेश-भूषा के आधार पर मुगल शैली व अपभ्रंश शैली इन दोनो शैलियो पर अन्तर स्थापित किया है रगं योजना रचना विधि और माध्यम की दृष्टि से इस शैली में मुगल शैली से अलग है। राजपुत कलीन चित्रशैली में भी अधिकाशं चित्र ग्रन्थ चित्र हैं।.

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