Search engine for discovering works of Art, research articles, and books related to Art and Culture
ShareThis
Javascript must be enabled to continue!

अनामिका के साहित्य की विशेषताएँ

View through CrossRef
समकालीन कविताओं की पृष्टभूमि ही यथार्थवादी रही है। समाज के वास्तविकताओं को लेकर चलने वाली कविता ही समकालीन कविता की श्रेणी में आती है। अपने आस-पास के परिवेश को लेकर चलना का काम ही समकालीन कविता की आधार बिन्दु है। पूर्ण रूप से आँखों देखी सच्ची तस्वीर ही इस समय की रचनाओं का आधार बिन्दु रहा है। ये रचनाएं आज के परिवेश, समय और समाज से जुड़ी हुई हैं। अपने सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक आदि परिस्थितियों की कहानी का स्पष्ट प्रमाण है विसंगतियाँ  आज कल की सामाजिक परिस्थितियाँ जटिल से जटिल बनती जा रही है। समाज में हर तरफ असुरक्षा, अजनबीपन, एकाकीपन, अस्तित्व पर खतरा, राजनीतिक विसंगतियाँ आदि परिवेश ने हमारे सामने एक जटिल स्थिति पैदा कर दिया है। मूल्य संकट भी भ्रष्ट परिस्थितियों के सामने एक नए रूप में, एक नए प्रश्न के साथ खड़ी हैं जो आदर्शों की दीवारों को गिरा दे रही हैं। समकालीन रचनाएँ ही इन्हीं अमानवीय अत्याचारों के खिलाफ अपनी आवाज़ को बुलंद की हुई है। आज का समाज अर्थ को ही मुख्य मानकर चलता है। समकालीन रचनाकार समाज की अनीति के साथ ही अच्छी बातों को भी जनता के सामने लाने का काम करते हैं। समकालीन रचनाकार समाज के मानवीय चेतना पैदा करने का काम करते हैं बिना किसी स्वार्थ और स्वहित के। समकालीन कविता उत्तर आधुनिक विसंगतियों, स्त्री विमर्श, दलित, आदिवासी विमर्श, आदिवासी विमर्श, राजनैतिक विमर्श, वृद्ध विमर्श, बच्चा विमर्श, परिस्थिति विमर्श, सांप्रदायिक विमर्श, मीडिया विमर्श आदि प्रवृतियों के साथ गोचर होती हैं। अनामिका की गणना समकालीन साहित्यकारों के जिस श्रेणी में किया जाता है, वह श्रेणी स्त्रीवाद की प्रमुख वाणी है, जो मीरा, महादेवी वर्मा जैसी रचनाकारों की परंपरा को पूरा करती हुई, अपने ठोस प्रमाण के साथ एक अलग दर्ज कायम करती है। अनामिका की रचनाएं धर्मदर्शन, पौराणिक नीति तथा मानव चिंतन के परिणाम स्वरुप व्यक्त हुई हैं। इनमें सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक अनेक परिस्थितियों का उद्भव होता हुआ दिखाई देता है।
Title: अनामिका के साहित्य की विशेषताएँ
Description:
समकालीन कविताओं की पृष्टभूमि ही यथार्थवादी रही है। समाज के वास्तविकताओं को लेकर चलने वाली कविता ही समकालीन कविता की श्रेणी में आती है। अपने आस-पास के परिवेश को लेकर चलना का काम ही समकालीन कविता की आधार बिन्दु है। पूर्ण रूप से आँखों देखी सच्ची तस्वीर ही इस समय की रचनाओं का आधार बिन्दु रहा है। ये रचनाएं आज के परिवेश, समय और समाज से जुड़ी हुई हैं। अपने सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक आदि परिस्थितियों की कहानी का स्पष्ट प्रमाण है विसंगतियाँ  आज कल की सामाजिक परिस्थितियाँ जटिल से जटिल बनती जा रही है। समाज में हर तरफ असुरक्षा, अजनबीपन, एकाकीपन, अस्तित्व पर खतरा, राजनीतिक विसंगतियाँ आदि परिवेश ने हमारे सामने एक जटिल स्थिति पैदा कर दिया है। मूल्य संकट भी भ्रष्ट परिस्थितियों के सामने एक नए रूप में, एक नए प्रश्न के साथ खड़ी हैं जो आदर्शों की दीवारों को गिरा दे रही हैं। समकालीन रचनाएँ ही इन्हीं अमानवीय अत्याचारों के खिलाफ अपनी आवाज़ को बुलंद की हुई है। आज का समाज अर्थ को ही मुख्य मानकर चलता है। समकालीन रचनाकार समाज की अनीति के साथ ही अच्छी बातों को भी जनता के सामने लाने का काम करते हैं। समकालीन रचनाकार समाज के मानवीय चेतना पैदा करने का काम करते हैं बिना किसी स्वार्थ और स्वहित के। समकालीन कविता उत्तर आधुनिक विसंगतियों, स्त्री विमर्श, दलित, आदिवासी विमर्श, आदिवासी विमर्श, राजनैतिक विमर्श, वृद्ध विमर्श, बच्चा विमर्श, परिस्थिति विमर्श, सांप्रदायिक विमर्श, मीडिया विमर्श आदि प्रवृतियों के साथ गोचर होती हैं। अनामिका की गणना समकालीन साहित्यकारों के जिस श्रेणी में किया जाता है, वह श्रेणी स्त्रीवाद की प्रमुख वाणी है, जो मीरा, महादेवी वर्मा जैसी रचनाकारों की परंपरा को पूरा करती हुई, अपने ठोस प्रमाण के साथ एक अलग दर्ज कायम करती है। अनामिका की रचनाएं धर्मदर्शन, पौराणिक नीति तथा मानव चिंतन के परिणाम स्वरुप व्यक्त हुई हैं। इनमें सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक अनेक परिस्थितियों का उद्भव होता हुआ दिखाई देता है।.

Related Results

अनामिका की कविता में स्त्री विमर्श के विविध आयाम
अनामिका की कविता में स्त्री विमर्श के विविध आयाम
अनामिका की कविताओं में स्त्री विमर्श के विविध आयाम के संदर्भ में देखा जा सकता है जिसमें स्त्री विमर्श के आधारभूत कारणों के रूप में अनामिका का स्त्री विमर्श की अवधारणा, स्वरूप और स्...
शिक्षा के क्षेत्र में उर्दू साहित्य का प्रभाव
शिक्षा के क्षेत्र में उर्दू साहित्य का प्रभाव
भारतीय शिक्षा प्रणाली में उर्दू साहित्य का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और बहुआयामी रहा है। यह शोध पत्र शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में उर्दू साहित्य के प्रभाव का विस्तृत विश्लेषण प्रस...
आधुनिक हिंदी साहित्य को आकार देने में लोक साहित्य की भूमिका
आधुनिक हिंदी साहित्य को आकार देने में लोक साहित्य की भूमिका
सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के अधिक पुरातन रूपों और अधिक आधुनिक साहित्यिक विधियों के बीच एक सेतु के रूप में, लोक साहित्य आधुनिक हिंदी साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण रहा है। कहावतें, गीत...
पं० जगन्नाथ के लोक साहित्य में सामाजिक मूल्य
पं० जगन्नाथ के लोक साहित्य में सामाजिक मूल्य
सामाजिक मूल्य वे सिद्धांत हैं जो किसी भी समाज में लोगों के व्यवहार और क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं। ये मूल्य सामाजिक व्यवहार, संवेदनशीलता और पारस्परिक सम्मान पर आधारित होते हैं औ...
आधुनिक हिंदी साहित्य और नारी (राजनीतिक परिपेक्ष के अंतर्गत)
आधुनिक हिंदी साहित्य और नारी (राजनीतिक परिपेक्ष के अंतर्गत)
प्रस्तुत लेख आधुनिक साहित्य और नारी के अंतर्गत भारतीय राजनीति में महिलाओं की भूमिका का अध्ययन राजनीतिक दृष्टिकोण से किया गया है । इस विषय के अंतर्गत राजनीति में आधुनिक महिलाओं की भ...
अमरकांत के बाल-साहित्य का समाजशास्त्रीय अनुशीलन
अमरकांत के बाल-साहित्य का समाजशास्त्रीय अनुशीलन
अमरकांत जी एक बाल साहित्यकार भी हैं। उनका वाल-साहित्य वच्चों की रूचि के अनुसार है। उन्होंने सरल भाषा में बाल साहित्य को निर्मित किया है अतः वच्चे उसे आसानी से समझ पाते हैं। उन्होंन...
नई कहानी आंदोलन का हिंदी साहित्य पर प्रभाव
नई कहानी आंदोलन का हिंदी साहित्य पर प्रभाव
नई कहानी आंदोलन हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण साहित्यिक परिवर्तन था, जिसने हिंदी कहानी लेखन को नया आयाम दिया। यह आंदोलन 1950 के दशक के बाद उभरा और परंपरागत कथा लेखन से हटकर सामाज...
Hindi Sahity Me Narivad Ka Svarup
Hindi Sahity Me Narivad Ka Svarup
आज के मुख्यधारा नारीवाद की प्रकृति–प्रवृत्ति चाहे जो भी हो, औरत की प्रकृति–प्रवृत्ति अपने शोषण के पहले दिन से ही प्रतिरोध कर रही है और आज भी है। औरत एक जिन्दा मनुष्य है जिसने जड़त...

Back to Top