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तुलसीदास के काव्य में पक्षियों के संदर्भ

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तुलसीदास कृत 'रामचरित मानस में भी पक्षियों के वर्णन बहुतायत से आये हैं। जिनका प्रयोग स्थल विशेष के अनुसार विभिन्न रूपों में हुआ है। स्वयं तुलसीदास की ग्रंथ की विशेषता बताते हुए कहते हैं कि उसके अन्तर्गत और भी जो अनेक प्रसंग की कथायें है, वही इसमें तोते कोयल आदि रंग-बिरंगे पक्षी है.और कथा अनेक प्रसंगा। तेड सुक पिक बहुवरन विहंगा ।।'अन्य सभी कवियों की भाँति तुलसी के काव्य में भी सभी पक्षी काव्य सौन्दर्य वर्धन के लिए विभिन्न अलंकारिक प्रयोगो जैसे उपमा, रूपक उत्प्रेक्षा आदि एवं कुछ प्रचलित रूढ़ियों के रूप में जाये हैं। कीपय उदाहरण दृष्टव्य है -मोर सभी पक्षियों में सबसे सुंदर पक्षी माना जाता है। रामचंद्र जी के सुंदर देते हुए कहते हैं कि राम जी का मोर के कंठश्यामल शरीर की उपमा मोर सेकी सी कान्तिवाला हरिताभ श्याम शरीर है।केकि कंठ दुति स्यामल अंगा । २स्त्रियों की सुंदर पाल की उपमा प्रायः हंस की गति से दी जाती है। राम सीता जी को भी हंसगामिनी संबोधित करते है और उन्हें हंसिनी की उपमा देते हुए कहते हैं कि तुम वन के योग्य नहीं हो क्योंकि मानसरोवर के अमृत के समान जल से पाली हुई हंसिनी कहीं खारे समुद्र में जीवित रह सकती है।
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Title: तुलसीदास के काव्य में पक्षियों के संदर्भ
Description:
तुलसीदास कृत 'रामचरित मानस में भी पक्षियों के वर्णन बहुतायत से आये हैं। जिनका प्रयोग स्थल विशेष के अनुसार विभिन्न रूपों में हुआ है। स्वयं तुलसीदास की ग्रंथ की विशेषता बताते हुए कहते हैं कि उसके अन्तर्गत और भी जो अनेक प्रसंग की कथायें है, वही इसमें तोते कोयल आदि रंग-बिरंगे पक्षी है.
और कथा अनेक प्रसंगा। तेड सुक पिक बहुवरन विहंगा ।।'अन्य सभी कवियों की भाँति तुलसी के काव्य में भी सभी पक्षी काव्य सौन्दर्य वर्धन के लिए विभिन्न अलंकारिक प्रयोगो जैसे उपमा, रूपक उत्प्रेक्षा आदि एवं कुछ प्रचलित रूढ़ियों के रूप में जाये हैं। कीपय उदाहरण दृष्टव्य है -मोर सभी पक्षियों में सबसे सुंदर पक्षी माना जाता है। रामचंद्र जी के सुंदर देते हुए कहते हैं कि राम जी का मोर के कंठश्यामल शरीर की उपमा मोर सेकी सी कान्तिवाला हरिताभ श्याम शरीर है।केकि कंठ दुति स्यामल अंगा । २स्त्रियों की सुंदर पाल की उपमा प्रायः हंस की गति से दी जाती है। राम सीता जी को भी हंसगामिनी संबोधित करते है और उन्हें हंसिनी की उपमा देते हुए कहते हैं कि तुम वन के योग्य नहीं हो क्योंकि मानसरोवर के अमृत के समान जल से पाली हुई हंसिनी कहीं खारे समुद्र में जीवित रह सकती है।.

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