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सामाजिक यथार्थ और उसके उपागम

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समाजशास्त्र के अध्यायन में पिछले कुछ दशकों में विज्ञानवादिता पर आवश्यकता से अधिक बल दिया गया। उसी के सन्दर्भ में समाजशास्त्र में सामाजिक यथार्थ को समझने के लिये एक नवीन परिप्रेक्ष्य का उदय हुआ। इस परिप्रक्ष्य के समर्थक समाजशास्त्रियों ने उन वर्गो, व्यक्तियों एवं समूहों के अध्ययन पर जोर दिया जो, काफी समय से उपेक्षित रहे हैं तथा जिन्हें व्यवस्था द्वारा कोई संरक्षण नहीं मिल पाया है। 
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Title: सामाजिक यथार्थ और उसके उपागम
Description:
समाजशास्त्र के अध्यायन में पिछले कुछ दशकों में विज्ञानवादिता पर आवश्यकता से अधिक बल दिया गया। उसी के सन्दर्भ में समाजशास्त्र में सामाजिक यथार्थ को समझने के लिये एक नवीन परिप्रेक्ष्य का उदय हुआ। इस परिप्रक्ष्य के समर्थक समाजशास्त्रियों ने उन वर्गो, व्यक्तियों एवं समूहों के अध्ययन पर जोर दिया जो, काफी समय से उपेक्षित रहे हैं तथा जिन्हें व्यवस्था द्वारा कोई संरक्षण नहीं मिल पाया है। .

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