Search engine for discovering works of Art, research articles, and books related to Art and Culture
ShareThis
Javascript must be enabled to continue!

महिला आत्मकथाओं में स्त्री जीवन

View through CrossRef
हिन्दी की स्त्री लेखिकाओं की आत्मकथाओं का अध्ययन करने के उपरांत यह स्पष्ट हो जाता है कि उन्होंने अपने जीवन में भोगे हुए यथार्थ के अनुभवों को दूसरों तक पहुँचाया है। जिससे स्त्री लेखिकाओं ने लेखन के माध्यम से अपने अस्तित्व को स्थापित करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। साहित्य में आत्मकथा का अपना विशेष स्थान है। आत्मकथा में लेखक के गुण-दोष तथा स्वयं का भोगे गए जीवन का विस्तार होता है। हिंदी की उत्कृष्ट आत्मकथाओ में स्वीकृत सिर्फ एक महिला की कथा नहीं पूरे युग की कथा है। जिस हिन्दी साहित्य में महिला आत्मलेखन की परंपरा का नितांत अभाव था, वहाँ अब महिला साहित्यकारों की एक के बाद एक आत्मकथाओं का प्रकाश में आना इस बात का प्रमाण है कि अब महिलाओं पर सामाजिक व्यवस्था के बंधन कुछ शिथिल हुए है।
Title: महिला आत्मकथाओं में स्त्री जीवन
Description:
हिन्दी की स्त्री लेखिकाओं की आत्मकथाओं का अध्ययन करने के उपरांत यह स्पष्ट हो जाता है कि उन्होंने अपने जीवन में भोगे हुए यथार्थ के अनुभवों को दूसरों तक पहुँचाया है। जिससे स्त्री लेखिकाओं ने लेखन के माध्यम से अपने अस्तित्व को स्थापित करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। साहित्य में आत्मकथा का अपना विशेष स्थान है। आत्मकथा में लेखक के गुण-दोष तथा स्वयं का भोगे गए जीवन का विस्तार होता है। हिंदी की उत्कृष्ट आत्मकथाओ में स्वीकृत सिर्फ एक महिला की कथा नहीं पूरे युग की कथा है। जिस हिन्दी साहित्य में महिला आत्मलेखन की परंपरा का नितांत अभाव था, वहाँ अब महिला साहित्यकारों की एक के बाद एक आत्मकथाओं का प्रकाश में आना इस बात का प्रमाण है कि अब महिलाओं पर सामाजिक व्यवस्था के बंधन कुछ शिथिल हुए है।.

Related Results

कृष्णा सोबती के उपन्यासों में चित्रित नैतिक समस्याएँ
कृष्णा सोबती के उपन्यासों में चित्रित नैतिक समस्याएँ
भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की सुविख्यात कथाकार कृष्णा सोबतीजी के उपन्यासों में चित्रित नैतिक समस्याओं पर प्रकाश डालने पर ज्ञात होता है। कृष्णाजी ने अपने उपन्यासों में उन ...
कृष्णा सोबती के उपन्यासों में चित्रित आर्थिक समस्याएँ
कृष्णा सोबती के उपन्यासों में चित्रित आर्थिक समस्याएँ
हिन्दी की सुविख्यात लेखिका कृष्णा सोबती जी ने अपने उपन्यासों में अधिकतर समाज के मध्यवर्ग को चित्रित किया है। जिसके अन्तर्गत उच्च मध्यवर्ग व मध्यवर्ग दोनों का ही समावेश है। मध्यवर्ग...
पं० जगन्नाथ के लोक साहित्य में सामाजिक मूल्य
पं० जगन्नाथ के लोक साहित्य में सामाजिक मूल्य
सामाजिक मूल्य वे सिद्धांत हैं जो किसी भी समाज में लोगों के व्यवहार और क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं। ये मूल्य सामाजिक व्यवहार, संवेदनशीलता और पारस्परिक सम्मान पर आधारित होते हैं औ...
बृहत्संहिता में भूगर्भ जलविद्या
बृहत्संहिता में भूगर्भ जलविद्या
जल ही जीवन है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जीवन का प्रारम्भ ही जल से हुआ है। जल की आवश्यकता मनुष्य को नित्य प्रति पड़ती है। इसके बिना जीवन नहीं चल सकता। इसलिये मानव सभ्यता का विकास ही...
प्रेमचंद की कहानियों में सामाजिक यथार्थ
प्रेमचंद की कहानियों में सामाजिक यथार्थ
हिंदी साहित्य के इतिहास में मुंशी प्रेमचंद का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने अपनी कहानियों के माध्यम से भारतीय समाज की उस सच्चाई को प्रस्तुत किया, जिसे अक्सर उपेक्षित किया जा...
समकालीन विमर्श के विभिन्न आयाम
समकालीन विमर्श के विभिन्न आयाम
यह सदी विमर्शों की सदी है । यानि समाज की किसी भी समस्या पर चर्चा–परिचर्चा, संवाद, तर्क–वितर्क आदि । दूसरे शब्दों में कहा जाये तो जब व्यक्ति किसी समूह में किसी विषय पर चिन्तन अथचा च...
बदलते परिवेश में किशोरियों में पोषक तत्त्वों के अभाव में स्वास्थ्य पर पड़ने वाला प्रभाव का अध्ययन
बदलते परिवेश में किशोरियों में पोषक तत्त्वों के अभाव में स्वास्थ्य पर पड़ने वाला प्रभाव का अध्ययन
पोषण मानव जीवन की आधारभूत आवश्यकता है। मानव जीवन में सर्वाधिक तेज गति से वृद्धि और विकास किशोरावस्था में होता है। यह अवस्था आमतौर पर 13 वर्ष से लेकर 19 वर्ष तक रहती है। इस दौरान कि...

Back to Top