Javascript must be enabled to continue!
हिंदी उपन्यासों में चित्रित आदिवासी नारियों की समस्याएँ
View through CrossRef
आदिवासी नारी भी अनेक समस्याओं से घिरी हुई है। अज्ञान, अशिक्षा, अंधविश्वास, बेरोजगारी, कुपोषण, शोषण, बलात्कार और स्वास्थ की दुरावस्था जैसी समस्याएँ उसके जीवन को ध्वस्त कर रही है। आदिवासी नारियों के संदर्भ में सचेंद्रकुमार के विचार है, "आज की स्थिति में देखा जाए तो आदिवासी महिलाएं हर संकटों से घिरी हुई है। सबसे ज्यादा संकट सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था का है । इनके पास आजीविका का साधन नहीं है। एक स्थान पर रखने के लिए घर नहीं है । अत यह खानाबदोश और बंजारों की जिंदगी जीने के लिए मजबूर है।"" यह आदिवासी नारियाँ समस्याओं में अपने जीवन को निखारती है। आदिवासी नारी का संघर्ष दोहरा संघर्ष है। एक ओर उसे पूरे परिवार की जिम्मेदारी को उठाना है और दूसरी ओर स्त्री होने के कारण अस्तित्व की रक्षा एवं शोषण से बचना है। आदिवासी नारी पारिवारिक समस्याएँ एवं बाहरी शोषण के बीच पीसती दिखाई देती है । बाहा समाज के संपर्क में आने के कारण आज वह पुरुषों अहंभाव का भी शिकार होती दिखाई देती है। आदिवासी नारी की समस्याओं में औद्योगिककीकरण के कारण और इजाफा हुआ है ।
Title: हिंदी उपन्यासों में चित्रित आदिवासी नारियों की समस्याएँ
Description:
आदिवासी नारी भी अनेक समस्याओं से घिरी हुई है। अज्ञान, अशिक्षा, अंधविश्वास, बेरोजगारी, कुपोषण, शोषण, बलात्कार और स्वास्थ की दुरावस्था जैसी समस्याएँ उसके जीवन को ध्वस्त कर रही है। आदिवासी नारियों के संदर्भ में सचेंद्रकुमार के विचार है, "आज की स्थिति में देखा जाए तो आदिवासी महिलाएं हर संकटों से घिरी हुई है। सबसे ज्यादा संकट सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था का है । इनके पास आजीविका का साधन नहीं है। एक स्थान पर रखने के लिए घर नहीं है । अत यह खानाबदोश और बंजारों की जिंदगी जीने के लिए मजबूर है।"" यह आदिवासी नारियाँ समस्याओं में अपने जीवन को निखारती है। आदिवासी नारी का संघर्ष दोहरा संघर्ष है। एक ओर उसे पूरे परिवार की जिम्मेदारी को उठाना है और दूसरी ओर स्त्री होने के कारण अस्तित्व की रक्षा एवं शोषण से बचना है। आदिवासी नारी पारिवारिक समस्याएँ एवं बाहरी शोषण के बीच पीसती दिखाई देती है । बाहा समाज के संपर्क में आने के कारण आज वह पुरुषों अहंभाव का भी शिकार होती दिखाई देती है। आदिवासी नारी की समस्याओं में औद्योगिककीकरण के कारण और इजाफा हुआ है ।.
Related Results
कृष्णा सोबती के उपन्यासों में चित्रित नैतिक समस्याएँ
कृष्णा सोबती के उपन्यासों में चित्रित नैतिक समस्याएँ
भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की सुविख्यात कथाकार कृष्णा सोबतीजी के उपन्यासों में चित्रित नैतिक समस्याओं पर प्रकाश डालने पर ज्ञात होता है। कृष्णाजी ने अपने उपन्यासों में उन ...
कृष्णा सोबती के उपन्यासों में चित्रित आर्थिक समस्याएँ
कृष्णा सोबती के उपन्यासों में चित्रित आर्थिक समस्याएँ
हिन्दी की सुविख्यात लेखिका कृष्णा सोबती जी ने अपने उपन्यासों में अधिकतर समाज के मध्यवर्ग को चित्रित किया है। जिसके अन्तर्गत उच्च मध्यवर्ग व मध्यवर्ग दोनों का ही समावेश है। मध्यवर्ग...
सोशल मीडियाः अभिव्यक्ति के नए चौनल
सोशल मीडियाः अभिव्यक्ति के नए चौनल
1947 में भारत को आजादी मिली थी। देश के प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की आजादी 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान के लागू होने के उपरान्त मिला था, किन्तु कुछ साल पहले तक अभिव्यक्ति के ...
हिंदी भाषा की विविध भूमिकाएँ
हिंदी भाषा की विविध भूमिकाएँ
सारांश– हिंदी भाषा की कई महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँ हैं, जो इसके सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक महत्त्व को दर्शाती हैं। इसकी भूमिकाओं को अलग-अलग दृष्टिकोणों से समझा जा सकता ...
confluence of mystery and love in Hindi fiction : Analysis of thrillers, fiction and romantic novels
confluence of mystery and love in Hindi fiction : Analysis of thrillers, fiction and romantic novels
यह शोधपत्र हिंदी कथा साहित्य में थ्रिलर, फिक्शन और रोमांटिक उपन्यासों में प्रकट होने वाले रहस्य और प्रेम के संगम का विश्लेषण करता है। अध्ययन का उद्देश्य यह समझना है कि कैसे इन उपन्...
आधुनिक हिंदी साहित्य को आकार देने में लोक साहित्य की भूमिका
आधुनिक हिंदी साहित्य को आकार देने में लोक साहित्य की भूमिका
सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के अधिक पुरातन रूपों और अधिक आधुनिक साहित्यिक विधियों के बीच एक सेतु के रूप में, लोक साहित्य आधुनिक हिंदी साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण रहा है। कहावतें, गीत...
भारत में सूचना का अधिकार और सुशासन: पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिक सशक्तीकरण का संस्थागत विश्लेषण
भारत में सूचना का अधिकार और सुशासन: पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिक सशक्तीकरण का संस्थागत विश्लेषण
सूचना का अधिकार (RTI) आधुनिक लोकतांत्रिक शासन में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और नागरिक सशक्तिकरण का एक महत्वपूर्ण उपकरण है। भारत में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 प्रशासनिक कार्यप्रण...
Kirtilata ka punarpath
Kirtilata ka punarpath
भारतीय वाङ्ग्मय में राजप्रशस्ति काव्यों की अविछिन्न परंपरा रही है। चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में पाणिनी के ‘पातालविजय’ और ‘जम्बावतीविजय’ से लेकर वामन, उदभट्ट, धनंजय के ‘दसरूपक’ से होत...

