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ग्रामीण जीवन की विडम्बनाएँ और सामाजिक प्रतिरोध: मैत्रेयी पुष्पा के कथा साहित्य का अध्ययन

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यह शोध-पत्र “ग्रामीण जीवन की विडम्बनाएँ और सामाजिक प्रतिरोध : मैत्रेयी पुष्पा के कथा साहित्य का अध्ययन” के अंतर्गत भारतीय ग्रामीण समाज की जटिल सामाजिक संरचना, उसमें निहित अंतर्विरोधों तथा उन विडम्बनाओं के बीच उभरती प्रतिरोध चेतना का विश्लेषण करने का उद्देश्य रखता है। इस अध्ययन का प्रमुख लक्ष्य यह स्पष्ट करना है कि मैत्रेयी पुष्पा अपने कथा-साहित्य में किस प्रकार ग्रामीण परिवेश की जातिगत असमानता, पितृसत्तात्मक नियंत्रण, आर्थिक विषमता और सांस्कृतिक रूढ़ियों को उद्घाटित करती हैं तथा इन परिस्थितियों में पात्रों के माध्यम से किस प्रकार सामाजिक प्रतिरोध के स्वर विकसित होते हैं। यह शोध मुख्यतः विमर्शात्मक और विश्लेषणात्मक पद्धति पर आधारित है, जिसमें समाजशास्त्रीय तथा नारीवादी दृष्टिकोण को आधार बनाकर पाठ-विश्लेषण किया जाएगा। अध्ययन के लिए मैत्रेयी पुष्पा की प्रमुख कृतियाँ जैसे ‘इदन्नमम्’, ‘अल्मा कबूतरी’, ‘छिन्नमस्ता’ तथा अन्य कथा-रचनाओं को संदर्भित करते हुए ग्रामीण जीवन के विविध आयामों का परीक्षण किया जाएगा। शोध का निष्कर्ष इस दिशा में उन्मुख होगा कि ग्रामीण विडम्बनाएँ केवल सामाजिक यथार्थ का चित्रण मात्र नहीं हैं, बल्कि उनके भीतर एक अंत:सलिला के रूप में प्रतिरोध की चेतना प्रवाहित होती है, जो स्त्री और हाशिए के समुदायों को आत्मस्वर और आत्मनिर्णय की शक्ति प्रदान करती है। इस प्रकार यह अध्ययन यह स्थापित करने का प्रयास करेगा कि मैत्रेयी पुष्पा का कथा-साहित्य ग्रामीण समाज के अंतर्विरोधों को उजागर करते हुए परिवर्तन की संभावनाओं को भी रेखांकित करता है।
Title: ग्रामीण जीवन की विडम्बनाएँ और सामाजिक प्रतिरोध: मैत्रेयी पुष्पा के कथा साहित्य का अध्ययन
Description:
यह शोध-पत्र “ग्रामीण जीवन की विडम्बनाएँ और सामाजिक प्रतिरोध : मैत्रेयी पुष्पा के कथा साहित्य का अध्ययन” के अंतर्गत भारतीय ग्रामीण समाज की जटिल सामाजिक संरचना, उसमें निहित अंतर्विरोधों तथा उन विडम्बनाओं के बीच उभरती प्रतिरोध चेतना का विश्लेषण करने का उद्देश्य रखता है। इस अध्ययन का प्रमुख लक्ष्य यह स्पष्ट करना है कि मैत्रेयी पुष्पा अपने कथा-साहित्य में किस प्रकार ग्रामीण परिवेश की जातिगत असमानता, पितृसत्तात्मक नियंत्रण, आर्थिक विषमता और सांस्कृतिक रूढ़ियों को उद्घाटित करती हैं तथा इन परिस्थितियों में पात्रों के माध्यम से किस प्रकार सामाजिक प्रतिरोध के स्वर विकसित होते हैं। यह शोध मुख्यतः विमर्शात्मक और विश्लेषणात्मक पद्धति पर आधारित है, जिसमें समाजशास्त्रीय तथा नारीवादी दृष्टिकोण को आधार बनाकर पाठ-विश्लेषण किया जाएगा। अध्ययन के लिए मैत्रेयी पुष्पा की प्रमुख कृतियाँ जैसे ‘इदन्नमम्’, ‘अल्मा कबूतरी’, ‘छिन्नमस्ता’ तथा अन्य कथा-रचनाओं को संदर्भित करते हुए ग्रामीण जीवन के विविध आयामों का परीक्षण किया जाएगा। शोध का निष्कर्ष इस दिशा में उन्मुख होगा कि ग्रामीण विडम्बनाएँ केवल सामाजिक यथार्थ का चित्रण मात्र नहीं हैं, बल्कि उनके भीतर एक अंत:सलिला के रूप में प्रतिरोध की चेतना प्रवाहित होती है, जो स्त्री और हाशिए के समुदायों को आत्मस्वर और आत्मनिर्णय की शक्ति प्रदान करती है। इस प्रकार यह अध्ययन यह स्थापित करने का प्रयास करेगा कि मैत्रेयी पुष्पा का कथा-साहित्य ग्रामीण समाज के अंतर्विरोधों को उजागर करते हुए परिवर्तन की संभावनाओं को भी रेखांकित करता है।.

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