Search engine for discovering works of Art, research articles, and books related to Art and Culture
ShareThis
Javascript must be enabled to continue!

रीवा जिले में सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के बैंकों की गैर निष्पादित संपत्तियों का विश्लेषणात्मक अध्ययन’’

View through CrossRef
किसी भी अर्थव्यवस्था के विकास में बैंकिंग क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक सुदृढ़ और स्वस्थ बैंकिंग प्रणाली किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत आवश्यक है। गैर निष्पादित संपत्तियाँ (NPAs) बैंकिंग उद्योग के स्वास्थ्य का सबसे सटीक संकेतक हैं; अर्थात, ये बैंकों के प्रदर्शन को दर्शाते हैं। बैंकिंग क्षेत्र के NPAs भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बन गए हैं। गैर निष्पादित संपत्तियों  का बैंकों की तरलता (liquidity), शोधन क्षमता (solvency) और लाभप्रदता (profitability) पर सीधा प्रभाव पड़ता है। प्रस्तुत अध्ययन भारतीय सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बैंकों के प्रदर्शन का विश्लेषण करता है, जिसमें विशेष रूप से उनके NPAs पर ध्यान केंद्रित किया गया है। निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों के बीच एक तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है, जिसका आधार कुल सकल अग्रिमों (gross advances) के प्रतिशत के रूप में NPAs का अनुपात और क्षेत्र-वार औसत NPAs का प्रतिशत है। विश्लेषण के उद्देश्य से, NPAs को प्राथमिकता (priority) और गैर-प्राथमिकता (non-priority) वाले क्षेत्रों में भी वर्गीकृत किया गया है। अध्ययन का निष्कर्ष यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में NPAs का स्तर निजी क्षेत्र के बैंकों की तुलना में अधिक है। सार्वजनिक और निजी, दोनों क्षेत्रों के बैंकों में ‘‘बैंक ऑफ इंडिया’’ के औसत गैर निष्पादित संपत्तियाँ सर्वाधिक हैं, जबकि 'HDFC  बैंक’’ के औसत NPAs सबसे कम हैं। इसके अतिरिक्त, गैर-प्राथमिकता वाले क्षेत्र में ‘‘बैंक ऑफ इंडिया’’ के NPAs सर्वाधिक हैं, जबकि प्राथमिकता वाले क्षेत्र में 'YES cSad' के औसत NPAs सबसे कम हैं।
Publication and Advance Research Welfare Society
Title: रीवा जिले में सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के बैंकों की गैर निष्पादित संपत्तियों का विश्लेषणात्मक अध्ययन’’
Description:
किसी भी अर्थव्यवस्था के विकास में बैंकिंग क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक सुदृढ़ और स्वस्थ बैंकिंग प्रणाली किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत आवश्यक है। गैर निष्पादित संपत्तियाँ (NPAs) बैंकिंग उद्योग के स्वास्थ्य का सबसे सटीक संकेतक हैं; अर्थात, ये बैंकों के प्रदर्शन को दर्शाते हैं। बैंकिंग क्षेत्र के NPAs भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बन गए हैं। गैर निष्पादित संपत्तियों  का बैंकों की तरलता (liquidity), शोधन क्षमता (solvency) और लाभप्रदता (profitability) पर सीधा प्रभाव पड़ता है। प्रस्तुत अध्ययन भारतीय सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बैंकों के प्रदर्शन का विश्लेषण करता है, जिसमें विशेष रूप से उनके NPAs पर ध्यान केंद्रित किया गया है। निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों के बीच एक तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है, जिसका आधार कुल सकल अग्रिमों (gross advances) के प्रतिशत के रूप में NPAs का अनुपात और क्षेत्र-वार औसत NPAs का प्रतिशत है। विश्लेषण के उद्देश्य से, NPAs को प्राथमिकता (priority) और गैर-प्राथमिकता (non-priority) वाले क्षेत्रों में भी वर्गीकृत किया गया है। अध्ययन का निष्कर्ष यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में NPAs का स्तर निजी क्षेत्र के बैंकों की तुलना में अधिक है। सार्वजनिक और निजी, दोनों क्षेत्रों के बैंकों में ‘‘बैंक ऑफ इंडिया’’ के औसत गैर निष्पादित संपत्तियाँ सर्वाधिक हैं, जबकि 'HDFC  बैंक’’ के औसत NPAs सबसे कम हैं। इसके अतिरिक्त, गैर-प्राथमिकता वाले क्षेत्र में ‘‘बैंक ऑफ इंडिया’’ के NPAs सर्वाधिक हैं, जबकि प्राथमिकता वाले क्षेत्र में 'YES cSad' के औसत NPAs सबसे कम हैं।.

Related Results

सरकारी एवं गैर-सरकारी विद्यालयों में माध्यमिक स्तर पर अध्ययनरत् छात्र एवं छात्राओं की कम्प्यूटर अभिवृत्ति का अध्ययन
सरकारी एवं गैर-सरकारी विद्यालयों में माध्यमिक स्तर पर अध्ययनरत् छात्र एवं छात्राओं की कम्प्यूटर अभिवृत्ति का अध्ययन
प्रस्तुत षोध अध्ययन में सरकारी एवं गैर सरकारी विद्यालयों में माध्यमिक स्तर पर अध्ययनरत् छात्र-छात्राओं की कम्प्यूटर अभिवृत्ति के संदर्भ में अध्ययन किया गया। षोध अध्ययन में ब्लाॅक न...
सोशल मीडियाः अभिव्यक्ति के नए चौनल
सोशल मीडियाः अभिव्यक्ति के नए चौनल
1947 में भारत को आजादी मिली थी। देश के प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की आजादी 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान के लागू होने के उपरान्त मिला था, किन्तु कुछ साल पहले तक अभिव्यक्ति के ...
कृष्णा सोबती के उपन्यासों में चित्रित आर्थिक समस्याएँ
कृष्णा सोबती के उपन्यासों में चित्रित आर्थिक समस्याएँ
हिन्दी की सुविख्यात लेखिका कृष्णा सोबती जी ने अपने उपन्यासों में अधिकतर समाज के मध्यवर्ग को चित्रित किया है। जिसके अन्तर्गत उच्च मध्यवर्ग व मध्यवर्ग दोनों का ही समावेश है। मध्यवर्ग...
कृष्णा सोबती के उपन्यासों में चित्रित नैतिक समस्याएँ
कृष्णा सोबती के उपन्यासों में चित्रित नैतिक समस्याएँ
भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की सुविख्यात कथाकार कृष्णा सोबतीजी के उपन्यासों में चित्रित नैतिक समस्याओं पर प्रकाश डालने पर ज्ञात होता है। कृष्णाजी ने अपने उपन्यासों में उन ...
भारत में सूचना का अधिकार और सुशासन: पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिक सशक्तीकरण का संस्थागत विश्लेषण
भारत में सूचना का अधिकार और सुशासन: पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिक सशक्तीकरण का संस्थागत विश्लेषण
सूचना का अधिकार (RTI) आधुनिक लोकतांत्रिक शासन में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और नागरिक सशक्तिकरण का एक महत्वपूर्ण उपकरण है। भारत में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 प्रशासनिक कार्यप्रण...
नारायणपुर जिले के अबूझमाड़िया जनजाति का समाज एवं अर्थव्यवस्था का अध्ययन
नारायणपुर जिले के अबूझमाड़िया जनजाति का समाज एवं अर्थव्यवस्था का अध्ययन
यह अध्ययन छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में निवास करने वाली अबूझमाड़िया जनजाति के सामाजिक एवं आर्थिक जीवन का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन का उद्देश्य इस जनजाति की सामाजिक संरचना,...
मानवतावादी जीवनदृष्टि: आधुनिक परिप्रेक्ष्य में
मानवतावादी जीवनदृष्टि: आधुनिक परिप्रेक्ष्य में
मानवतावादी जीवनदृष्टि में व्यष्टिगत् और समष्टिगत जीवन विकास के आदर्श निहित हैं। यह मनुष्य जीवन को इस धरती पर अति विशिष्ट जीवन के रूप में स्वीकारती है एवं मानव, प्रकृति और परमात्मा ...
उत्तराखंड के संस्कृत महाविद्यालयों में संचालित शिक्षा व्यवस्था का समीक्षात्मक अध्ययन
उत्तराखंड के संस्कृत महाविद्यालयों में संचालित शिक्षा व्यवस्था का समीक्षात्मक अध्ययन
‘भारतस्य प्रतिष्ठे द्वे संस्कृतं संस्कृतिस्तथा’ संस्कृत भाषा, न केवल भारत की सांस्कृतिक विरासत की संग्राहिका है प्रत्युत् यह भारतीय आध्यात्मिकता की प्रवाहिका भी है। संस्कृत के इस म...

Back to Top