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भूमण्डलीकरण का हिन्दी उपन्यासो पर प्रभाव
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भूमण्डलीकरण एक ऐसी अवधारण है जो पूरे विश्व में एक ऐसी संस्कृति विकसित करती है, जो पूरे भूमण्डल को एक विश्वग्राम बनाने के लिए तत्पर हो । भारतीय संस्कृति हमेशा से सर्वसमावेशी रही है, जिसमें सारी संस्कृतियाँ घुल मिलकर एक हो गई हैं लेकिन भूमण्डलीकरण एवं आधुनिकीकरण की आँधी ने सब कुछ मटियामेट कर दिया, जिससे समाज में विभिन्न सांस्कृतिक समस्याएँ उत्पन्न हो गयी हैं। इसमें सांस्कृतिक विघटन, लोकसंस्कृति का ह्रास, बदलते संदर्भ, परम्पराओं का विघटन, बदलते प्रेम सम्बन्ध, बदलते मानवीय मूल्य, उपभोग की संस्कृति आदि समस्याएं प्रमुख हैं ।भूमण्डलीकरण के प्रभाव से उत्पन्न सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व प्राकृतिक असंतुलन के कारण को नई सदी के उपन्यासकार, समाज को आगाह करने का दायित्व बखूबी निभा रहे हैं। इक्कीसवीं सदी में भूमण्डलीकरण एवं पश्चिमीकरण के अंधानुकरण से अपने समाज और परिवार से व्यक्ति कटता जा रहा है, पश्चिम की भोगवादी संस्कृति उसे आकर्षित कर रही है, इसकी व्यापक पड़ताल उपन्यासकारों ने अपने भिन्न भिन्न उपन्यासों के माध्यम से किया है।
Title: भूमण्डलीकरण का हिन्दी उपन्यासो पर प्रभाव
Description:
भूमण्डलीकरण एक ऐसी अवधारण है जो पूरे विश्व में एक ऐसी संस्कृति विकसित करती है, जो पूरे भूमण्डल को एक विश्वग्राम बनाने के लिए तत्पर हो । भारतीय संस्कृति हमेशा से सर्वसमावेशी रही है, जिसमें सारी संस्कृतियाँ घुल मिलकर एक हो गई हैं लेकिन भूमण्डलीकरण एवं आधुनिकीकरण की आँधी ने सब कुछ मटियामेट कर दिया, जिससे समाज में विभिन्न सांस्कृतिक समस्याएँ उत्पन्न हो गयी हैं। इसमें सांस्कृतिक विघटन, लोकसंस्कृति का ह्रास, बदलते संदर्भ, परम्पराओं का विघटन, बदलते प्रेम सम्बन्ध, बदलते मानवीय मूल्य, उपभोग की संस्कृति आदि समस्याएं प्रमुख हैं ।भूमण्डलीकरण के प्रभाव से उत्पन्न सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व प्राकृतिक असंतुलन के कारण को नई सदी के उपन्यासकार, समाज को आगाह करने का दायित्व बखूबी निभा रहे हैं। इक्कीसवीं सदी में भूमण्डलीकरण एवं पश्चिमीकरण के अंधानुकरण से अपने समाज और परिवार से व्यक्ति कटता जा रहा है, पश्चिम की भोगवादी संस्कृति उसे आकर्षित कर रही है, इसकी व्यापक पड़ताल उपन्यासकारों ने अपने भिन्न भिन्न उपन्यासों के माध्यम से किया है।.
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