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वर्तमान दौर की भारतीय राजनीति के मुख्य मुद्दे और जीवंत लोकतंत्र-एक विश्लेषणात्मक अध्ययन
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समकालीन भारतीय राजनीतिक परिदृश्य और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर इसके प्रभाव का एक विश्लेषणात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। प्रस्तुत शोध पत्र वर्ष 2014 से 2026 तक के कालखंड को आधार बनाकर समकालीन भारतीय राजनीतिक परिदृश्य और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर इसके प्रभाव का एक विश्लेषणात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। वर्ष 2014 और 2019 में एकदलीय स्पष्ट बहुमत के बाद, वर्ष 2024 के आम चुनावों ने भारतीय राजनीति को एक नया मोड़ दिया है, जहाँ ‘बहुदलीय गठबंधन सरकार‘ के युग की वापसी हुई है और वर्ष 2026 तक आते-आते यह व्यवस्था राजनीतिक संतुलन का मुख्य आधार बन चुकी है। यह शोध गुणात्मक और विश्लेषणात्मक पद्धति का उपयोग करते हुए डिजिटल कल्याणवाद (क्पहपजंस ॅमसंितमपेउ) और ‘लाभार्थी वर्ग‘ के उद्भव, जाति जनगणना की मांग, तथा वित्तीय व प्रशासनिक संघवाद (थ्पेबंस ंदक ।कउपदपेजतंजपअम थ्मकमतंसपेउ) में बढ़ते तनावों का अध्ययन करता है। इसके अतिरिक्त, यह शोध पत्र संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता, चुनावी बॉन्ड के बाद राजनीतिक वित्तपोषण का संकट, एआई (।प्) व डीपफेक द्वारा संचालित एल्गोरिद्मिक धु्रवीकरण, तथा वर्ष 2026 में प्रस्तावित लोकसभा परिसीमन (क्मसपउपजंजपवद) से उत्पन्न होने वाली उत्तर-दक्षिण प्रतिनिधित्व की जनसांख्यिकीय चुनौती का गंभीर विश्लेषण करता है। निष्कर्ष यह दर्शाता है कि भारतीय लोकतंत्र संस्थागत क्षरण की चिंताओं के बावजूद, मतदाताओं की राजनीतिक परिपक्वता और न्यायपालिका की सक्रियता के कारण अपने आंतरिक सुधार और संतुलन की क्षमता (ैमस-िब्वततमबजपदह डमबींदपेउ) को बनाए हुए है।
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Title: वर्तमान दौर की भारतीय राजनीति के मुख्य मुद्दे और जीवंत लोकतंत्र-एक विश्लेषणात्मक अध्ययन
Description:
समकालीन भारतीय राजनीतिक परिदृश्य और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर इसके प्रभाव का एक विश्लेषणात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। प्रस्तुत शोध पत्र वर्ष 2014 से 2026 तक के कालखंड को आधार बनाकर समकालीन भारतीय राजनीतिक परिदृश्य और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर इसके प्रभाव का एक विश्लेषणात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। वर्ष 2014 और 2019 में एकदलीय स्पष्ट बहुमत के बाद, वर्ष 2024 के आम चुनावों ने भारतीय राजनीति को एक नया मोड़ दिया है, जहाँ ‘बहुदलीय गठबंधन सरकार‘ के युग की वापसी हुई है और वर्ष 2026 तक आते-आते यह व्यवस्था राजनीतिक संतुलन का मुख्य आधार बन चुकी है। यह शोध गुणात्मक और विश्लेषणात्मक पद्धति का उपयोग करते हुए डिजिटल कल्याणवाद (क्पहपजंस ॅमसंितमपेउ) और ‘लाभार्थी वर्ग‘ के उद्भव, जाति जनगणना की मांग, तथा वित्तीय व प्रशासनिक संघवाद (थ्पेबंस ंदक ।कउपदपेजतंजपअम थ्मकमतंसपेउ) में बढ़ते तनावों का अध्ययन करता है। इसके अतिरिक्त, यह शोध पत्र संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता, चुनावी बॉन्ड के बाद राजनीतिक वित्तपोषण का संकट, एआई (।प्) व डीपफेक द्वारा संचालित एल्गोरिद्मिक धु्रवीकरण, तथा वर्ष 2026 में प्रस्तावित लोकसभा परिसीमन (क्मसपउपजंजपवद) से उत्पन्न होने वाली उत्तर-दक्षिण प्रतिनिधित्व की जनसांख्यिकीय चुनौती का गंभीर विश्लेषण करता है। निष्कर्ष यह दर्शाता है कि भारतीय लोकतंत्र संस्थागत क्षरण की चिंताओं के बावजूद, मतदाताओं की राजनीतिक परिपक्वता और न्यायपालिका की सक्रियता के कारण अपने आंतरिक सुधार और संतुलन की क्षमता (ैमस-िब्वततमबजपदह डमबींदपेउ) को बनाए हुए है।.
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